नई दिल्ली: पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से लेकर जंतर-मंतर की सड़कों तक एक ही गूँज सुनाई दे रही है—”अरावली बचाओ”। भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला, जो कभी उत्तर भारत के लिए एक सुरक्षा कवच मानी जाती थी, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के एक तकनीकी फैसले ने इस विवाद को जन्म दिया है, जिसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने मोर्चा खोल दिया है। यह सिर्फ एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि भारत के पारिस्थितिक भविष्य (Ecological Future) पर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस बन चुका है। लोगों को डर है कि अगर आज #SaveAravalli को नहीं बचाया गया, तो दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और 100 मीटर का विवाद: क्यों मचा है हंगामा?
विवाद की मुख्य जड़ 20 नवंबर 2025 को आया सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है, जिसमें पहाड़ियों की परिभाषा को नए सिरे से तय किया गया है। कोर्ट के अनुसार, अब केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाओं को ही ‘पहाड़ी’ माना जाएगा और अरावली संरक्षण के दायरे में रखा जाएगा। इस तकनीकी परिभाषा ने पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का दावा है कि अरावली का लगभग 90% हिस्सा कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों और टीलों से बना है। यदि इस परिभाषा को लागू किया गया, तो अरावली का एक बड़ा हिस्सा वन संरक्षण अधिनियम (Forest Conservation Act) के सुरक्षा घेरे से बाहर हो जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि जिस जमीन पर अभी निर्माण कार्य या माइनिंग प्रतिबंधित है, वह भू-माफियाओं और कॉर्पोरेट घरानों के लिए वैध शिकार बन जाएगी।
रेगिस्तान को रोकने वाली ‘हरी दीवार’ के गिरने का डर
अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि यह थार रेगिस्तान को पूर्वी राजस्थान और गंगा के उपजाऊ मैदानी इलाकों की ओर बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि अगर अरावली की पहाड़ियां माइनिंग और रियल एस्टेट की भेंट चढ़ गईं, तो मरुस्थलीकरण (Desertification) की प्रक्रिया तेज हो जाएगी। धूल भरी आंधियां सीधे दिल्ली और हरियाणा के शहरों में प्रवेश करेंगी, जिससे वायु प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाएगा। इसके अलावा, अरावली चंबल, साबरमती और लूणी जैसी नदियों का जलग्रहण क्षेत्र है। पहाड़ियां खत्म होने का मतलब है कि ग्राउंडवाटर रिचार्ज पूरी तरह रुक जाएगा, जिससे पहले से ही जल संकट झेल रहे गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहर रहने लायक नहीं बचेंगे।
नेताओं और निगमों का ‘लालच’ बनाम जनता की आवाज़
प्रसिद्ध लेखक और पर्यावरणविद प्रणय लाल ने अरावली को “खोया हुआ पर्वत” (A Mountain Lost) कहा था। आज उनका डर सच साबित होता दिख रहा है। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान के जरिए लोग राजनेताओं और प्रशासन की ‘अदूरदर्शिता’ पर सवाल उठा रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि पहाड़ियों की नई परिभाषा केवल रियल एस्टेट लॉबी और माइनिंग माफिया को फायदा पहुँचाने के लिए गढ़ी गई है। वायरल वीडियो और पोस्ट के जरिए लोग सुप्रीम कोर्ट से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विकास के नाम पर जैव-विविधता (Biodiversity) और लाखों साल पुरानी विरासत की बलि नहीं दी जा सकती। यह लड़ाई अब केवल पेड़ों की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सांस लेने के अधिकार की है।
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