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वर्दी में बाबा बागेश्वर की कथा, भजन में गाते दिखे जवान… वीडियो वायरल होते ही क्यों भड़क उठे आर्मी वेटेरन्स?

बाबा बागेश्वर धाम के आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा में वर्दीधारी सेना के जवानों की मौजूदगी पर विवाद खड़ा हो गया है। वीडियो वायरल होने के बाद पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इसे सेना के अनुशासन के खिलाफ बताया। जानिए पूरा मामला।

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राजस्थान के कोटा जिले के रामगंज मंडी में चल रहे बाबा बागेश्वर धाम के आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की रामकथा और श्री गौ माता महोत्सव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में भारतीय सेना के कुछ जवान वर्दी में मंच के बेहद करीब खड़े नजर आ रहे हैं। वीडियो खुद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आधिकारिक एक्स अकाउंट से साझा किया गया, जिसके बाद यह चर्चा का विषय बन गया। वायरल क्लिप में देखा जा सकता है कि कथा के दौरान भजन का माहौल है और उसी बीच सेना के जवान ‘दिल दिया है, जान भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए’ गीत गाते हुए दिखते हैं। धीरेंद्र शास्त्री खुद मंच से इन जवानों को अपने पास बुलाते हैं और उनके साथ देशभक्ति गीत गाते हैं। बताया जा रहा है कि ये जवान कोटा आर्मी स्टेशन से आए थे और 14 सिख रेजीमेंट से जुड़े हैं। कथा के दौरान बाबा बागेश्वर ने जवानों की सराहना भी की और उनके शौर्य को नमन किया। हालांकि, वीडियो सामने आने के बाद इस कार्यक्रम की धार्मिक भावना से ज्यादा सेना के अनुशासन और वर्दी के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज हो गई।

वीडियो वायरल होते ही पूर्व सैन्य अधिकारियों ने उठाए सवाल

जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, सेना के कई पूर्व अधिकारियों और वेटेरन्स ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। पूर्व कर्नल धनवीर सिंह ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि वर्दीधारी सैनिकों का इस तरह किसी धार्मिक मंच पर दिखाई देना शर्मनाक है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ऐसे व्यवहार को सलाम नहीं किया जा सकता और इस पर सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को ध्यान देना चाहिए। कर्नल धनवीर ने यह भी मांग की कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सैन्य इकाइयों और टुकड़ियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिए। वहीं, मन अमन सिंह छिना नाम के एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा कि जब बड़े सैन्य अधिकारी खुद बाबाओं से मिलने जाते हैं, तो फिर आम सैनिकों से दूरी की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उन्होंने इसे सेना में अनुशासन के गिरते स्तर से जोड़ा। इस बहस ने सोशल मीडिया पर तेजी पकड़ ली और देखते ही देखते यह मुद्दा धार्मिक आस्था से निकलकर सैन्य मर्यादा पर आकर टिक गया।

‘वर्दी केवल ड्यूटी के लिए’, अनुशासन पर दी गई नसीहत

इस पूरे विवाद में पूर्व कर्नल पवन नायर की प्रतिक्रिया भी काफी चर्चा में रही। उन्होंने साफ कहा कि यह स्थिति बेहद अनियमित है और सैनिकों को इस तरह वर्दी में सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, वर्दी पहनने की अनुमति केवल तभी होनी चाहिए जब कोई सैनिक अपनी यूनिट के भीतर स्थित मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में किसी रेजिमेंटल कार्यक्रम में भाग ले रहा हो। उन्होंने कहा कि सेना की वर्दी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि अनुशासन, तटस्थता और देश की एकता का प्रतीक है। ऐसे में किसी धार्मिक मंच पर वर्दी में मौजूदगी से गलत संदेश जाता है। वेटेरन्स का तर्क है कि भारतीय सेना को हमेशा राजनीति और धर्म से दूर रखा गया है, ताकि उसकी निष्पक्षता और सम्मान बना रहे। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या व्यक्तिगत आस्था और आधिकारिक पहचान के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

आस्था बनाम अनुशासन, क्यों बढ़ गया विवाद

इस पूरे घटनाक्रम ने देश में एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ समर्थक इसे सैनिकों की देशभक्ति और धार्मिक आस्था से जोड़कर देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ वेटेरन्स और रक्षा मामलों से जुड़े जानकार इसे सेना के स्थापित नियमों के खिलाफ बता रहे हैं। बाबा बागेश्वर की कथा में शामिल जवानों का गीत गाना और मंच पर मौजूद रहना कई लोगों को भावनात्मक रूप से सही लग सकता है, लेकिन सेना की परंपरा और अनुशासन के नजरिए से यह सवालों के घेरे में है। फिलहाल सेना की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन वीडियो ने यह साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया के दौर में छोटी-सी घटना भी बड़े विवाद का रूप ले सकती है। यह मामला सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय सेना की निष्पक्ष छवि, अनुशासन और वर्दी की गरिमा से जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सेना इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या भविष्य में ऐसे मामलों को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।

 

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