बिहार के मधुबनी Medical College के नाम से एक कथित पत्र इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। इस पत्र में दावा किया गया है कि रमजान के दौरान यदि कोई लड़का और लड़की कॉलेज परिसर में साथ खड़े पाए जाते हैं तो उनका निकाह करा दिया जाएगा। पत्र में यह भी लिखा गया है कि इस निर्देश का उल्लंघन करने पर संबंधित छात्र-छात्रा खुद जिम्मेदार होंगे। 25 फरवरी की तारीख वाले इस दस्तावेज़ पर कॉलेज के लेटरहेड, मुहर और प्रिंसिपल के हस्ताक्षर जैसे प्रतीक दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि पहली नजर में यह एक आधिकारिक आदेश जैसा प्रतीत होता है। जैसे ही यह पत्र वायरल हुआ, छात्रों और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का माहौल बन गया।
पोस्ट के बाद तेज हुई बहस
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक यूजर द्वारा इस कथित सर्कुलर की तस्वीर साझा किए जाने के बाद मामला तेजी से फैल गया। कुछ ही घंटों में पोस्ट पर बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई लोगों ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सवाल उठाए, जबकि कुछ ने इसकी भाषा और प्रारूप पर संदेह जताया। लोगों का कहना था कि किसी शैक्षणिक संस्थान द्वारा इस तरह का आदेश जारी करना असामान्य लगता है। वहीं कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि पत्र में इस्तेमाल की गई अंग्रेजी और प्रस्तुति आधिकारिक दस्तावेज़ जैसी नहीं दिखती। सोशल मीडिया पर इसे लेकर अलग-अलग तरह की राय सामने आ रही है, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
कॉलेज प्रशासन ने किया खंडन
मामले ने तूल पकड़ने के बाद Madhubani Medical College प्रशासन की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई। कॉलेज प्रबंधन ने साफ शब्दों में कहा कि इस तरह का कोई आदेश जारी नहीं किया गया है और वायरल हो रहा पत्र पूरी तरह फर्जी है। प्रशासन का कहना है कि कॉलेज की छवि खराब करने के उद्देश्य से किसी अज्ञात व्यक्ति ने यह पत्र तैयार कर सोशल मीडिया पर फैलाया है। साथ ही यह भी बताया गया कि पूरे मामले की जांच की जाएगी और जरूरत पड़ी तो कानूनी कदम उठाए जाएंगे। कॉलेज की ओर से आधिकारिक बयान जारी कर छात्रों से अपील की गई है कि वे अफवाहों पर भरोसा न करें और केवल अधिकृत सूचनाओं पर ही विश्वास करें।
जांच के बाद ही सामने आएगी सच्चाई
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह कथित पत्र किसने तैयार किया और किस मकसद से इसे फैलाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों के दौर में किसी भी संस्थान के नाम से नकली दस्तावेज बनाकर उसे वायरल करना आसान हो गया है। ऐसे मामलों में तकनीकी जांच के जरिए ही यह पता लगाया जा सकता है कि दस्तावेज की वास्तविकता क्या है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि आखिर ऐसा पत्र बनाने के पीछे किसकी मंशा हो सकती है। हालांकि, जब तक आधिकारिक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। फिलहाल प्रशासन की ओर से इसे फर्जी बताया गया है और आगे की कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है।
