मध्य पूर्व की राजनीति में भूचाल लाने वाली रात में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त सैन्य हमला किया। राजधानी तेहरान समेत कई प्रमुख शहरों में मिसाइल और ड्रोन हमलों की आवाज़ों से आसमान कांप उठा। इस हमले के बाद सबसे सनसनीखेज दावा सामने आया—ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत। पहले इजरायल की ओर से संकेत दिए गए और फिर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि इस सैन्य कार्रवाई में खामेनेई मारे गए हैं। कुछ ही घंटों बाद ईरानी सरकारी तंत्र की ओर से भी इस दावे की पुष्टि कर दी गई। जैसे ही यह खबर फैली, पूरे ईरान में मातम पसर गया और हजारों लोग सड़कों पर उतर आए।
नया सुप्रीम लीडर और फतवे की गूंज
खामेनेई की मौत के बाद ईरान में सत्ता को लेकर तेजी से घटनाक्रम बदला। आपात बैठक के बाद अली रजा अराफी को ईरान का नया सुप्रीम लीडर घोषित किया गया। उनके नाम की घोषणा के साथ ही देशभर में शोक सभाएं और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसी बीच अराफी की ओर से जारी एक कड़े फतवे ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींच लिया। फतवे में साफ कहा गया—“खून का बदला खून से लिया जाएगा।” इस बयान को अमेरिका और इजरायल के खिलाफ खुली चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। ईरान के धार्मिक और राजनीतिक हलकों में इसे बदले की नीति का आधिकारिक ऐलान माना जा रहा है, जिसने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है।
ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ और तबाही का आंकड़ा
अमेरिका ने इस संयुक्त सैन्य कार्रवाई को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम दिया है। इस अभियान के तहत ईरान के सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो और कथित परमाणु ढांचों को निशाना बनाया गया। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, इन हमलों में कम से कम 201 लोगों की मौत हुई है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई है। वहीं ईरान का आरोप है कि अमेरिका और इजरायल ने मिलकर संप्रभु देश पर हमला किया। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने भी क्षेत्र के कई ठिकानों पर मिसाइल हमले किए, जिससे हालात और विस्फोटक हो गए।
वैश्विक असर और आगे क्या?
खामेनेई की मौत और नए सुप्रीम लीडर की ताजपोशी ने पूरी दुनिया की राजनीति को झकझोर दिया है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर यूरोपीय देशों तक, सभी पक्ष संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। हालांकि ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही। तेल की कीमतों में उछाल, शेयर बाजारों में गिरावट और युद्ध की आशंका ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी खतरे में डाल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को अपनी चपेट में ले सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें तेहरान, वॉशिंगटन और तेल अवीव पर टिकी हैं—जहां से आने वाला अगला बयान इतिहास की दिशा तय कर सकता है।
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