भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी ने पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में कहा कि उनका देश नदियों के पानी में अपने हिस्से से कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की ओर से उठाए गए कदमों से पाकिस्तान के जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। बिलावल ने कहा कि यदि पानी के प्रवाह को रोकने की कोई कोशिश की गई तो पाकिस्तान इसका जवाब देगा। उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव पर नई चर्चा शुरू हो गई है।
पहलगाम हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला
भारत ने पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कई कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाए थे। इन्हीं में सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला भी शामिल था। भारत का कहना है कि सीमा पार आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौतों को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। भारतीय अधिकारियों ने कई बार स्पष्ट किया है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक इस मुद्दे पर सामान्य स्थिति बहाल होना मुश्किल है। भारत लगातार यह भी कहता रहा है कि किसी भी समझौते के सफल संचालन के लिए आपसी विश्वास और जवाबदेही जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठा चुका है पाकिस्तान यह मुद्दा
सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी चिंता जाहिर कर रहा है। हाल के महीनों में पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र समेत कई वैश्विक मंचों पर इस विषय को उठाया है। यूरोप में आयोजित एक सम्मेलन में भी पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने दावा किया कि भारत की जल परियोजनाओं से भविष्य में पाकिस्तान के जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, भारत का कहना है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय नियमों और तकनीकी मानकों के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। भारत ने यह भी दोहराया है कि सिंधु जल संधि स्थायी अधिकार नहीं, बल्कि परिस्थितियों और पारस्परिक जिम्मेदारियों के आधार पर संचालित होने वाला समझौता है।
क्या है सिंधु जल संधि और क्यों बढ़ रही है चिंता?
साल 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए थे। दशकों तक यह संधि दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद लागू रही। हालांकि हाल के वर्षों में आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और जल प्रबंधन से जुड़े मुद्दों ने इस समझौते को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल सुरक्षा भविष्य में दक्षिण एशिया की राजनीति और कूटनीति का अहम विषय बन सकती है। फिलहाल दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले समय में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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