भारतीय क्रिकेट जगत से 27 फरवरी को एक बेहद भावुक कर देने वाली खबर सामने आई, जब 97 ने अपने पिता खानचंद सिंह को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। पिता के निधन की खबर ने न सिर्फ रिंकू के परिवार, बल्कि उनके प्रशंसकों और क्रिकेट प्रेमियों को भी गहरे शोक में डुबो दिया। गरीबी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तक का सफर तय करने वाले Rinku Singh के जीवन में उनके पिता की भूमिका सबसे अहम रही है। यही वजह है कि अंतिम विदाई के पल हर किसी की आंखें नम कर गए।
पिता का निधन और परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
27 फरवरी की सुबह लगभग 5 बजे ग्रेटर नोएडा स्थित यथार्थ अस्पताल में खानचंद सिंह ने अपनी अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से लीवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और बीते कुछ हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे। कुछ दिन पहले उनकी तबीयत में सुधार की खबरें आई थीं, जिससे परिवार को उम्मीद बंधी थी कि हालात बेहतर होंगे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अचानक आई इस दुखद खबर ने रिंकू सिंह के परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। पिता के निधन की सूचना मिलते ही रिश्तेदार, परिचित और गांव के लोग शोक व्यक्त करने उनके घर पहुंचने लगे।
बेटे ने कंधा दिया, बड़े भाई ने दी मुखाग्नि
खानचंद सिंह का निधन ग्रेटर नोएडा में हुआ, जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को अलीगढ़ लाया गया। रिंकू सिंह उस वक्त चेन्नई में टीम इंडिया के साथ मौजूद थे, लेकिन जैसे ही उन्हें पिता के निधन की खबर मिली, वे तुरंत अलीगढ़ के लिए रवाना हो गए। अंतिम संस्कार के दौरान रिंकू ने अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर बेटे का फर्ज निभाया। वहीं, परिवार की परंपरा के अनुसार उनके बड़े भाई सोनू सिंह ने पिता को मुखाग्नि दी। श्मशान घाट पर मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं, क्योंकि यह सिर्फ एक पिता का अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान को विदाई थी जिसने अपने बेटे के सपनों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया।
संघर्षों से भरा पिता–पुत्र का रिश्ता
खानचंद सिंह पेशे से एलपीजी सिलेंडर डिलीवरी का काम करते थे। सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने कभी रिंकू के सपनों को बोझ नहीं समझा। बचपन में रिंकू ने कई बार आर्थिक तंगी देखी, लेकिन पिता का हौसला हमेशा मजबूत रहा। उन्होंने अपने बेटे को क्रिकेट खेलने से कभी नहीं रोका, बल्कि हर मुश्किल घड़ी में उसका साथ दिया। यही कारण है कि जब रिंकू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, तो उन्होंने कई मंचों पर अपने पिता के संघर्षों का जिक्र किया। आज वही पिता, जो बेटे की सफलता पर सबसे ज्यादा गर्व करते थे, इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके संघर्ष की कहानी हमेशा लोगों को प्रेरित करती रहेगी।
मैदान और परिवार के बीच रिंकू की कठिन परीक्षा
पिता की तबीयत बिगड़ने पर रिंकू इससे पहले चेन्नई से नोएडा पहुंचे थे और हालात में थोड़ा सुधार देखकर अगले दिन ही टीम इंडिया को दोबारा जॉइन कर लिया था। इसी वजह से वे 26 फरवरी को जिम्बाब्वे के खिलाफ सुपर-8 मुकाबले में नहीं खेल सके। उस मैच में भारतीय टीम ने 256 रन बनाए और जिम्बाब्वे की टीम 184 रन पर सिमट गई। हालांकि मैदान पर रिंकू की गैरमौजूदगी महसूस की गई, लेकिन हर कोई समझता था कि उनके लिए यह समय बेहद कठिन है। पिता के निधन के बाद रिंकू ने जिस तरह से परिवार और जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे सिर्फ मैदान के ही नहीं, बल्कि जीवन के भी सच्चे फाइटर हैं।
